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वेदान्त के सुप्रसिद्ध और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद


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जीवन परिचय -

सर्वप्रथम मैं वेदान्त के सुप्रसिद्ध और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद जी को उनकी पुण्यतिथि पर नमन करता हूं। स्वामीजी कलकत्ता ने बंगाली कायस्थ परिवार में जन्म लिया। स्वामी विवेकानन्द का वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। स्वामीजी, रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य थे। गुरु रामकृष्ण देव से सीखा कि समस्त जीवो मे स्वयं परमात्मा का वास है। उन्होंने षिक्षा ग्रहण की कि जो मानव जरूरतमंदो की सेवा/सहायता करता है, उससे वास्तव परमात्मा की सेवा की जाती है।


वर्ष 1783 में अमेरिका स्थित शिकागो एक विश्व धर्म महासभा का आयोजन किया गया था। जिसमें भारत के सनातन धर्म को प्रस्तुत करने हेतु स्वामीजी प्रतिनिधित्व किया। अमेरिका से लेकर यूरोप तक कई देषो में स्वामीजी ने आध्यात्मिकता और वेदान्त दर्शन का प्रचार प्रसार किया। उन्हें 2 मिनट का समय दिया गया जिसमें उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनो के साथ किया। उनके इस संबोधन ने सबका मन को जीता।

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देशभक्त संन्यासी के रूप में स्वामी विवेकानंदजी

भारत में स्वामी विवेकानंदजी एक देशभक्त संन्यासी के रूप में जाने जाते है। स्वामी विवेकानन्दजी के जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। स्वामीजी के विचार आज भी राष्ट्रभक्तों की प्रेरणा के स्रोत है। उन्होनें हिंदुत्व के पुनरू उद्धार और राष्ट्रीयता की भावना को अपने विचारों से प्रज्ज्वलित किया।

एक दिन स्वामी विवेकानंद जी अपने आश्रम विश्राम कर रहे थे। तभी एक दुखी व्यक्ति उनके पास आकर स्वामी विवेकानंद जी के चरणों में गिर कर कहने लगा महाराज मैं अपने जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ, हर कार्य मन लगाकर करता हूँ, फिर भी आज तक मुझे सफलता नहीं मिली। व्यक्ति की बाते सुनकर स्वामी विवेकानंद बोले ठीक है, आप मेरे इस पालतू कुत्ते को थोड़ी देर तक घुमाकर लाये, तब तक मैं आपकी समस्या समाधान खोजता हूँ। इसके बाद वह व्यक्ति कुत्ते को घुमाने के लिए ले गया। कुछ समय बीतने के बाद वह व्यक्ति वापस आया। तो स्वामी विवेकानंद जी ने पूछ की यह कुत्ता इतना हाँफ क्यों रहा है। तुम थोड़े से भी थके हुए नहीं लग रहे हो। आखिर ऐसा क्यों हुआ ?

व्यक्ति ने कहा कि मैं तो सीधा अपने रास्ते पर चल रहा था जबकि यह कुत्ता इधर उधर रास्ते भर भागता रहा। कुछ भी देखता तो उधर ही दौड़ जाता था। जिसके कारण यह बहुत थक गया। स्वामी विवेकानंद जी ने मुस्कुराते हुए कहा बस यही तुम्हारी समस्या का समाधान है, तुम्हारी सफलता की मंजिल तो तुम्हारे सामने ही है, लेकिन तुम अपने मंजिल के बजाय इधर उधर भागते रहते हो। इसलिए तुम अपने जीवन में सफल नही हो पाए। इस बात को सुनकर उस व्यक्ति को समझ आ गया था की यदि सफल होना है तो हमे अपने मंजिल पर ध्यान केन्द्रीत करना चाहिए।

शिक्षा - 

स्वामी विवेकानंद जी के इस किस्से से यही शिक्षा मिलती है की हमें क्या करना है? हमें क्या बनना है ? यदि हम इस विषय पर गहनता से विचार नहीं करते है, और दूसरों को देखकर वैसा ही हम करने लगते है तो हम अपने सफलता के पास होते हुए दूर चले जाते है। अतः यदि जीवन में सफल होना है, तो हमेशा हमें अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त -

  • शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हो सके।
  • शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भर बने।
  • बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।
  • धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।
  • पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान देना चाहिए।
  • शिक्षा, गुरू गृह में प्राप्त की जा सकती है।
  • शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए।
  • सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जान चाहिये।
  • देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाय।
  • मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए।
  • शिक्षा ऐसी हो जो सीखने वाले को जीवन संघर्ष से लड़ने की शक्ती दे।
  • स्वामी विवेकानंद के अनुसार व्यक्ति को अपनी रूचि को महत्व देना चाहिए।

 स्वामीजी के विचार -

  • जैसा तुम सोचते हो वैसे ही बन जाओगे, खुद को निर्बल मानोगे तो निर्बल, खुद को सबल मानोगे तो सबल बन जाओगे।
  • उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये।
  • ब्रह्मांड की सभी शक्तियां हमारे अंदर हैं। यह हम ही हैं जिन्होंने अपनी आंखों के सामने हाथ रखा है और रोते हुए कहा कि अंधेरा है।
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